पलाश!! तुम्हारा खत पढ़ा! पढ़ा,कई बार पढ़ा..! हर बार मेरी नज़र तुम्हारे लिखे हर्फ़ दर हर्फ़ को चूमती जाती हर बार मेरी नज़र तुम्हारे भरे ज़ज़्बात दर ज़ज़्बात चुनती जाती जब नज़रों ने भर लिया प्रेम अपार! पलाश! टपक पड़ी आँखे,गिरे बूँद हज़ार..! खत के आखिर में जहाँ मेरा नाम लिखा है और मेरे नाम पर तुम्हारे अधरों का रंग लगा है बेशक वो लाल रंग तुम्हारे पंखुडियों सी नाज़ुक नर्म होंठों के छुअन का प्यारा सा एहसास है वो हिस्सा हमेशा हमेशा मेरी रूह के पास है इस तरह! मेरे उस दस्तावेज को तुमने अग्रसारित कर दिया है पलाश! एक अदद उस कागज पर , सर्वस्व तुम्हारे नाम किया है एक अदद उस कागज़ पर हर जन्म तुम्हारे नाम किया है देवयशो 4 नवम्बर 2017
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चाँद देखा है आज देखना! एक बादल को पटरा बना कर.. चाँद को धुरी बना.. बच्चों की तरह.. see-saw खेलेंगे.. एक तरफ तुम बैठना, एक तरफ मैं बैठूंगा.. और चाँद को सहारे के लिए तुम पकड़ना तुम्हे सहारा दे सके, इसलिए थोड़ा सा चाँद मैं भी पकडूँगा.. तुम्हारे दुपट्टे से उस सूरज को ढ़क देंगे.. ताकि सवेरा जल्दी न हो.. सवेरा होते ही तुम्हारे माथे पर एक बोसा लूँगा.. वैसे ही जैसे झुक कर तुम मेरे बोसे सम्भालती हो.. वैसे ही थोड़ा झुक जाना.. तुम्हारे दुपट्टे में कुछ सितारे टांक दूंगा. और तोहफे में कुछ न दे पाया जो तुम्हे.. इस बार तोहफे में .. यही चाँद ले लेना.. पूर्णिमा का चाँद.. हाथ से जैसे तुम रोटी बनाती हो.. कुछ वैसे ही उसे चिपटा कर दूंगा.. और चूम के चाँद को.. तुम्हारे माथे की बिंदी बना दूंगा.. पता है तुम कैसी लगोगी.. इस सवाल का यही जवाब है, इक सवाल सा जवाब.. मेरी रूहानगी सी !! चाँद देखा है आज?? देवयशो

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